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सावधान! डोनाल्ड ट्रम्प का पंटर भारत आ रहा है-अशोक सवाई

(आंतरराष्ट्रीय)

हिंदी फिल्मों में दादागिरी, भाईगिरी करनेवाला या खलनायक का किरदार निभानेवाला एक अदाकार होता है। उसका एक पंटर भी होता है जो विरोधी गुट की अंदरूनी खबरे भाई तक पहुचाता है। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ इस फिल्म में संजय दत्त का सर्किट नाम का एक पंटर है। ये पंटर भाई का बडा विश्वसनीय होता है। ठीक वैसे ही ट्रंप अमरिका का राजदूत और खुद्द का निजी दूत बनाकर एक शख्स को दिल्ली भेज रहा है। जो अमरिका में विवादित व्यक्ती रहा है। जिसका नाम है Sergio Gor (सर्जिओ गोर) यह शख्स डोनाल्ड ट्रम्प का खास पंटर माना जाता है। ऐसे बडे पत्रकार आशिष चित्रांशी कहते है। लेकिन उस से भी आगे आंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक जानकरी रखनेवाले एवं वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते है की यह शख्स याने की सर्जिओ गोर ट्रंप का हमराज है, यस मॅन है, ट्रू काॅपी है। अब सोचिए ये आदमी ट्रंप जो बोलेगा वो ही करेगा ना? हमारे कमजोर विदेश मंत्री, कमजोर विदेश मंत्री की कमजोर विदेश नीती, कूटनीती देखकर डोनाल्ड ट्रम्प ने यह खेल खेला है। ऐसी आशंका लगती है। अच्छा! ये आदमी दिल्ली में बैठकर सिर्फ अमरिका का राजदूत बनकर काम नही करेगा बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच में Hyphenating का काम करेगा Hyphenate (हायफिनेट) का अर्थ है दो शब्द को जोडनेवाला सेतू (सेतू याने दो शब्दों को जोडने के लिए बिच में छोटी डॅश वाली रेषा। उदा. माता-पिता) यही सेतू भारत-पाकिस्तान को जोडने का काम करेगा ऐसा ट्रंप का कहना है। इसका मतलब यह हुवा की, ट्रंप भारत और पाकिस्तान को समान रूप से देखता है। भै ट्रंप महोदय जी… पाकिस्तान धर्म पर आधारित चलने वाला देश है, हम धर्म निरपेक्ष है। (हां यह बात अलग है की पिछले ग्यारह साल में हमारे मौजूदा सरकार के पाॅलिटिक्स लिडरों ने धर्म और राजनीती की खिचडी बना दी है, लेकिन यह स्थिती हमेशा के लिए नही होगी) पाकिस्तान के लिडर उनके सेना के अंकित होकर देश चलाते है, हमारा देश संवैधानिक मुल्यों पर चलता है। पाकिस्तान की सेना वहाॅं की राजनीती में हस्तक्षेप करती है, हमारी सेना इस से दूर रहती है। हमारा देश भौगोलिक और सामरिक दृष्टीसे कई गुना बडा है। और पाकिस्तान के मुकाबले शक्तिशाली भी है। हमारे सरकारे लोकतांत्रिक प्रकिया से बनती है, वहाॅं सेना की मर्जी से। (इसीलिए ट्रंप ने पाकिस्तान सेना प्रमुख असीफ मुनीर को खाने पर बुलाया था) और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है की पाकिस्तान आतंकवाद को पनाह देता है और उसका प्रयोग हमारे खिलाफ़ करता है। इसके अब तक के कई उदाहरण है। पहेलगाम आतंकी हमले का ताजा उदाहरण सबके सामने है। यह सारी दुनिया को पता है। फिर भी ट्रंप हमें पाकिस्तान के साथ खडा क्यों करना चाहता है। यह तो हमारे देश का, संप्रभूता का, और वजूद का घनघोर अपमान है। ऐसे तमाम फर्क दोनो देशों में है। फिर भी ट्रंप दोनो देशों को समान रूप से देखना चाहता है। क्यों? क्यों की पाकिस्तान अब इस्रायल जैसा अमरिका का लाडला बन चुका है। क्यों लाडला बना है? क्यों की, पाकिस्तान ने ट्रंप को शांती का नोबेल पुरस्कार देने की मांग की थी। जो भारत ने नही की। और करनी भी नही चाहिए। राजदूत के रूप में हम पर राजनैतिक चौकीदारी करने के लिए चौकीदार भेज दिया है। फिर भी हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री चुपचाप बैठे है। बिलकुल भी बोल नही रहे। चाहे मामला कुछ भी हो, कुछ भी देश विरोधी हो लेकिन हमारे साहब अमेरिका के विरोध में एक लब्ज भी नही बोलेंगे और ना ही किसी मंत्री को बोलने देंगे। क्यों? क्यों की उनके परम मित्र अडाणी का मामला अमेरिका के न्युयॉर्क कोर्ट में फसा है। अगर बोलते है तो मामला और बिघड सकता है ये बात हमारे जहाॅंपनाह बडी वकुबी से जानते है। तो वे खुद्द के लिए ‘आ बैल मुझे मार’ जैसी स्थिती क्यों पैदा करेंगे? वैसे तो हमारे शहेनशाह आलमगीर की स्थिती ‘घर में शेर और बाहर बकरी’ जैसी हो गयी। इधर विदेश मंत्री बोले जरूर लेकिन क्या बोले पता है? वे बोले चायना भी तो रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है लेकिन उस पर अमरिका ने जादा टेरिफ नही लगाया और हम पर 50% टेरिफ? भै… जय शंकर जी, आप अपनी विदेश नीती देखीए ना। आपकी विदेश नीती, कूटनीती बेहद कमजोर है, नियोजन शून्य है तभी तो अमरिका की हिंमत बढी है ना? अगर दुसरे मुल्कों की तरह ट्रंप को आप भी शुरू में ही हिंमत दिखाकर खडे बोल सुनाते तो आज आपको बच्चो जैसी बातें करने की नौबत नही आती। जैसे की बच्चे अपनी मम्मी से सिकायत करते है की, मम्मी जी हमारे बाजू वाले लडके को भी सवाल का जवाब नही आया, लेकिन टिचर ने उसको नही सिर्फ हमको ही क्लास में मुर्गा बनाया। यह तो वो ही बात हो गयी है बच्चों वाली।

अच्छा! सर्जिओ गोर जो राजनीती, विदेश नीती, कूटनीती में शून्य है ऐसे हमारे आंतरराष्ट्रीय स्तर के तज्ञ/जानकार कहते है। वो अमरिका का राजदूत बनकर सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर चुपचाप अपना काम नही करेगा। हमारे प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, बाकी मंत्री पर कुल मिलाकर हमारी सरकार की गतिविधीयों पर भी नजर रखेगा। इतना ही नही सर्जिओ गोर मध्य और दक्षिण आशियाई देशों के अमरिकन राजदूतों से याने की, श्रीलंका, बांग्लादेश इधर पाकिस्तान जैसे देशों के अमरिकन राजदूतों से संबंध, संपर्क और आपसी बातचीत करके सहयोग करेगा। इसकी सारी रिपोर्ट वो ट्रंप को देगा। मतलब उक्त देशों का प्रभारी बनकर काम करेगा। यह मकसद है ट्रंप का। हो सकता है इसी बहाने से वो आशियाई देशों पर अपनी पकड बनाना चाहता हो। ये हमारे देश के लिए काफी चिंताजनक और गंभीर मामला है। इस से हमारी सारी बारीक सारीक जानकारी और गतिविधीयाॅं बाहरी मुल्को में चली जाएगी। इस से हमारी विदेश नीती, अर्थनीती और कमजोर होकर खतरे में आ सकती है। ( वैसे तो खतरे में है ही) हम अब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट भी खेलेंगे। इसके दो कारण हो सकते है। पहला है पैसा कमाने का। और दुसरा हो सकता है की, पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मॅच खेलने के लिए हमारे बडे साहब पर कई ना कई गुप्त रूप से ट्रंप का दबाव भी हो सकता है। भै… लाडले के खातीर ट्रंप कोशिशे तो करेगा ही। पहेलगाम आतंकी हमले में हमारे २६ निर्दोष नागरिकों की हत्या हुयी, उनके खून के दाग अभी सुखे भी नही, उसके लिए ऑपरेशन सिंदूर किया। उस में भी सीमा पर बसे गावों के लोग मारे गये। उसके जख्म अभी तक भरे नही और हमारी भारत सरकार पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मॅच का खेल खेलने चली। दुसरी ओर चायना का राजदूत हमारे यहाॅं बैठे बैठे हमे ही सलाह दे रहा है की, कीसी दबंगयी के दबाव में मत आईए। (शायद ये इशारा अमेरिका की ओर था) इधर अमरिका का राजदूत ट्रंप के इशारों से हम पर दबाव बनाने की मंषा रखेगा और उधर चायना का राजदूत सलाह के रूप में हम पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। इस से यह अर्थ निकलता है की चायना और अमेरिका हमे अपनी अपनी ओर खिचने की खिचातानी कर रहे है। इसका कारण यह है की भारत १४० करोड जनता की बाजारपेठ है। इस लिए दोनो देश इस बाजारपेठ को छोडना नही चाहेंगे। चायना के साथ तो सौ अरब डाॅलर का ट्रेड चलता है। अमेरिका और चायना दोनो देश व्यापारी देश है। वे दोनो अपने अपने व्यापारी हित को ही तवज्जो देने वाले है। खैर! चायना के राजदूत ने हमे सलाह तो दी है। इसके लिए शुक्रिया भी अद़ा करना चाहिए, लेकिन पिछले तीन महिने में आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ जो हमारा युद्ध हुवा था, वो पाकिस्तान की आड़ में चायना भी हमारे साथ युद्ध लढ रहा था। यह नही बताया चायना के राजदूत ने? और हमें मुफ्त में सलाह दे रहा है। हमारे लिए यह दोहरा मापदंड क्यों भाई? अच्छा! हमारे देश की उत्तर भारतीय सीमा पर ४००० किमी की जमीन चायना ने हडप ली है। वहाॅं उसने हेलिपॅड, इमारते, सडके बनवाई है। और ख़बरों से यह भी पता चलता है की, चायना अब ब्रह्मपुत्रा नदी पर पूल का निर्माण भी कर रहा है। यह सारी हकिकत चायना का राजदूत क्यों नही बताना चाहता? यह सारे सवाल तो बनते ही है चायना से। युट्युब चॅनलों पर आंतरराष्ट्रीय राजनैतिक विश्लेषक, राजनैतिक तज्ञ, जाने माने बडे बडे पत्रकार, जानकार इनके द्वारा सारा विश्लेषण विश्वसनीय युट्युब चॅनलों पर चलता है। कुल मिलाकर अमेरिका और चायना की गतिविधीयाॅं देखकर मन में भयंकर तरह-तरह की आशंका उठने लगी की, कई हमारे कदम धीरे धीरे किसी गुप्त गुलामी की ओर तो नही बढ रहे है? आशंका तो आशंका होती है।

अतीत में कभी चायना को लाल लाल ऑंखे दिखाने वाले देश के रहनुमा अब चायना का दौरा करने जा रहे है। ऐसी ख़बरे चल रही है। वहाॅं उनके शब्द जब उनको याद आते है तो पता नही तब वे कैसा महसूस करेंगे? जब जा ही रहे है तो वहाॅं हमारे भूमी के बारे में भी चर्चा कर लिजिएगा साहब। जिस पर चायना जबरदस्ती कब्जा किये बैठा है। उधर अमेरिका बार बार हमारे मुखिया को बेइज्जत कर रहा है। वो हमारे किसी भी मुद्दे को मानने के लिए राजी नही। शायद चायना के साथ हात मिलाकर समस्या का हल निकालना चाहेंगे। अगर ऐसा होता है तो देश हित लिए अमरिका और अडाणी की साथ संगत छोडनी होगी। अमेरिका का इतिहास देखा जाए तो वो देश ऐतबार करने लायक देश कभी रहा ही नही। अपनी महाशक्ती की छबी बनाए रखने के लिए वो कुछ भी कर सकता है। पिछले कई सालों से हम धीरे धीरे दुनिया से अलग थलग पडते जा रहे है। आज की दौर में हम अपने आपको बिलकुल अकेले महसूस कर रहे है। भले ही दुनिया के दशों से हमारा व्यापार चल रहा हो। लेकिन दुनिया की नजरों से हमारी साख कम होते जा रही है। जो २०१४ से पहले बनी हुयी थी। यह वास्तव है। अब हमारे प्रधान सेवक के चायना दौरे को चायना कितना तवज्जो देता है? हमारी चायना के साथ किस मुद्दों पर बातचीत होगी? उसमें से क्या सार निकलता है? यह तो चायना दौरे के बाद ही पता चलेगा। लेकिन अमरिका के साथ हमारे रिस्ते अब बिघड चुके है, ये बात हर कोई जानता है। अब ‘नमस्ते ट्रंप’, और ‘अब की बार…’ वाली बात नही रही। अमरिका से हमारी दुरी बढती जा रही है। रूस और चायना हमारे साथ कितनी नजदिकियां बढाएंगे ये तो आनेवाला वक्त ही बता सकता है। कई ऐसा न हो जाये ‘न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के रहे न उधर के’ … अब भी वक्त है साहब, हमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी के लिखे हुये संविधान के एक एक आर्टिकल पर इमान-ए-ऐतबार अमल करना चाहिए। अगर हम ऐसा करते है तो देश तो मजबूत होगा ही और फिर हमारे लिए तीसरी महाशक्ती बनने का दिन भी जादा दूर नही रहेगा।

अशोक सवाई.

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