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पॅरिस में स्थापित की गयी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी की प्रतिमा-अशोक सवाई

(राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय)

            इस साल २६ नोव्हेंबर याने की संविधान दिवस  विशेष रूप से रहा है। भारत में संविधान के प्रति नफ़रती सोच रखनेवालों को छोड दिया जाऍ तो सारे देश में संविधान दिवस का उत्सव बडे उत्साह के साथ मनाया गया। जैसे की हर साल मनाया जाता है। लेकिन इस साल सात समंदर पार फ्रांस की राजधानी पॅरिस शहर में भारत को गौरवांकित करनेवाली और बहुजनों को गदगद करनेवाली घटना घटी। वह यह की संविधान दिवस के अवसर पर पॅरिस के युनेस्को मुख्यालय में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी की प्रतिमा का अनावरण किया गया। इसका अर्थ यह भी है की, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी अपने विचारों से ग्लोबल आयकॉन के रूप में पूरे विश्व को प्रेरित कर रहे है। यह प्रतिमा उनका वैश्विक प्रभाव दर्शाता है। इस समारंभ के शुभ अवसर पर युनेस्को के महानिदेशक मिस्र के खालिद अहमद अल-एनानी अली एज, पूर्व महानिदेशक सूश्री ऑड्रे अज़ोले, भारत के राजदूत विशाल शर्मा, युनेस्को के बडे बडे अफसर, और शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ती एवं नागरिक उपस्थित थे। युनेस्को का कार्यक्षेत्र मुख्यतः १) शिक्षा को बढ़ावा देना जिस में साक्षरता बढ़ानेवाले कार्यक्रम शामिल है, २) विज्ज्ञान और संस्कृती में आंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा, ३) विश्व धरोहर स्थल की पहचान  और संरक्षण करना और ४) आंतरराष्ट्रीय शांती और विकास को बढ़ावा देना यह प्रमुख कार्यक्षेत्र युनेस्को के है। युनेस्को का मुख्यालय फ्रान्स की राजधानी पॅरिस, में स्थित है। इसका पता- 7, प्लेस डे फाॅन्टेनाॅय 7, अरोडिसमेंट, पॅरिस। भारत में युनेस्को का मुख्यालय नई दिल्ली में है। और इस मुख्यालय के अंतर्गत भारत, नेपाल, भूतान, मालदीव, बांगलादेश, और श्रीलंका इन देशों के  युनेस्को का कारोबार क्षेत्र आता है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी एक ऐसे भारतीय नेता है, जिनकी सबसे ज्यादा प्रतिमा दुनिया भर के देशों में स्थापित है। यह हमारे देश के लिए कितनी गौरवपूर्ण बात है ना? हमारे देश में भी सबसे ज्यादा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी प्रतिमा है। लेकिन कुछ मुठ्ठीभर मनुवादी सोच रखनेवाले लोगों द्वारा सबसे ज्यादा उनकी प्रतिमा इसी देश में ही तोडी जाती है। यह हमारे देश के लिए बडी दुर्भाग्य पूर्ण बात है। पता नही  देश पर लगा यह  कलंक कब मिट जाएगा? आंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाबासाहेब जी की प्रतिमा स्थापित करने का सिलसिला जारी है और आगे भी जारी रहेगा। उनके विचारों से विश्वभर के देश प्रेरित होते रहेंगे। विश्वभर में तथागत गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी की प्रतिमा देखकर मनुवादी और कुंठित मानसिकता के लोगों में मन ही मन जलन होती है यह बात भी सच है। खैर! 

            अनिल मिश्रा नाम का व्यक्ती एक वकील है, वो ग्वाल्हेर हायकोर्ट में वकीली करता है। ग्वाल्हेर हायकोर्ट में बाबासाहेब जी की प्रतिमा लगाने के लिए वो विरोध कर रहा है। यह एहसान फ़रामोश नादान वकील संविधान से ही वकील बना है फिर भी बाबासाहेब का विरोध कर रहा है। और कहता है की, संविधान बाबासाहेब जी ने नही बी. एन. राव ने लिखा है। उससे कोई यह पुछे की अगर बी. एन. राव ने संविधान लिखा है तो दुनिया के देशों ने अपने अपने देश में उनकी प्रतिमा क्यों नही लगाई? हमारे देश में भी उनकी एक भी प्रतिमा क्यों नही? इसके जवाब अनिल मिश्रा के पास नही। वो बेवजह उलझुलूल बातें कर के देश का माहोल बिघाड रहा है। इस से ज्यादा दुसरा कोई निष्कर्ष नही निकलता। अरे भै मिश्राजी, मसौदा समिती में बी. ऐन. राव एक संवैधानिक सलाहगार के रूप में थे, इस से ज्यादा संविधान निर्मिती में उनका कोई योगदान नही था। सदन में उन्होने खुद्द कहाॅं था की, मसौदा समिती के एक सदस्य का निधन हुवा था उनकी जगह खाली थी। दो सदस्य दिल्ली से बहोत दूर थे इस लिए उनका दिल्ली में आना नही होता था। एक सदस्य की तबीयत नासाज चल रही थी और दो सदस्य अपने राज्य के कारोबारों में व्यस्त थे, तो हुवा युं की, संविधान निर्मिती का सारा भार डॉ. बी. आर. आंबेडकर जी पर आ पडा और वो उन्होने अकेले ही उठाया और संविधान निर्मिती का  काम पूर्ण किया। इस लिए संविधान निर्मिती का सारा श्रेय डॉ. बी. आर. आंबेडकर को ही जाता है। ऐसा सदन में बी. एन. राव ने स्पष्ट रूप से कहाॅं था। यह सारा इतिहास अनिल  मिश्रा को भी पता है। लेकिन बाबासाहेब के प्रति नफरत और कुंठित भाव से मानसिक रोग से ग्रस्त होने कारण मिश्रा ग्वाल्हेर हायकोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा लगाने के लिए विरोध करता है। मानसिक रोगी सिर्फ अकेला मिश्रा ही नही देश में ऐसे बहोत सारे मानसिक बिमारी से ग्रस्त रोगी है। इतिहास के चंद पन्नों पर बी. एन. राव का नाम आता है लेकिन बाबासाहेब... बाबासाहेब तो इतिहास के हर पन्नों पर मिलते है। चाहे राजनीती हो, अर्थ नीती हो, शिक्षा नीती हो, विदेश नीती हो, कृषी नीती हो, सामाजिक न्याय हो, अंग्रेजों का इतिहास हो, आरक्षण हो, महिलावों के प्रति सम्मान उनके लिए समान रूप से न्याय हक्क अधिकार हो या हर व्यक्ती में समानता की बात हो ऐसे तमाम क्षेत्र में बाबासाहेब छाये है और उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कूल मिलाकर भारत के इतिहास के  पन्नों पन्नों पर उनका नाम समाया है। उनके मुकाबले में बी. एन राव कहाॅं खडे है यह अलग से कहने की जरूरत नही। हमें  लगता है बी. एन. राव एक संवेदनशील और सौहार्दपूर्ण व्यक्ती रहे होंगे। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के प्रति उनके मन में आदर और संविधान के प्रति आस्था रही होगी। इस लिए नानकचंद रत्तू के गैर मौजूदगी में खुद्द बी. एन. राव ही बाबासाहेब के लिए चाय पानी की व्यवस्था करते थे। यह इतिहास है मिश्रा जी इसे जरा समझो और इतिहास को बेदखल कर के उलझुलूल बोलकर अपनी वकीली की साख और गरीमा को निचा ना गिराओ। और आनेवाली पिढीओं  को मिस गाइड ना करो। मनुवादी सोच के लोग बाबासाहेब से नफरत तो कर सकते है परंतु उनके विचारों को पराजित नही कर सकते यह काले पत्थर पर सफेद लकिर है हुजूर। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी ने भारत का इतिहास रचा कर इस देश के उज्वल भविष्य की तकद़ीर लिखी है जनाब! उसे कोई नही मिटा पाऍगा... कोई नही!   दुनिया के देश युं ही नही डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी की प्रतिमा अपने अपने देशों में स्थापित कर रहे है, क्यों की उस देशों ने बाबासाहेब के विचारों समझा, परखां और यह भी  समझा की, उनके विचारों के बिना हमारा  देश आगे नहीं बढ़ सकता  इस लिए दुनिया के देश अपने देशों में बाबासाहेब आंबेडकर जी की प्रतिमा स्थापित कर रहे है। उनकी प्रतिमा से उनके विचारों से उनके देशों को प्रेरणा मिलती है। इस बात को समझो मिश्रा जी। हां यह बात सच है की, आज  हमारे देश पर मनुवादी काले घने बादल छाये है लेकिन वो हमेशा के लिऍ नही रहेंगे, जब भी कभी वक्त अपनी करवट बदलेगा तब वो काले बादल निश्चित रूप से हट जायेंगे तब इस देश की धरती पर फिर से सूरज की नयी साफ सुतरी किरणे चमकेगी।

अशोक सवाई.

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