१०% ग्लोबल टेरिफ से दुनिया को राहत- अशोक सवाई

(आंतरराष्ट्रीय)
आज तक अमरीका का राष्ट्रपती डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया के मुल्कों से जो टेरिफ-टेरिफ का खेल, खेल रहा था अब अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के उस खेल का ही खेल कर दिया। याने की, जो ट्रम्प ने अलग अलग मुल्को पर अलग अलग फ़िसदी टॅक्स लगाया था वो एक ही झटके में घटाकर सारे मुल्कों के लिए समान रूप से १०% टॅक्स कर दिया, ग्लोबल टेरिफ। और दुनिया को टेरिफ से राहत दी है। टेरिफ के विरोध में वहाॅं के सुप्रीम कोर्ट में कानूनी मामला या विवाद चल रहा था। उसका आज ट्रम्प के विरोध में फैसला आया। और अमरीका सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार लोकतांत्रिक मुल्कों लिए लोकतंत्र की परिभाषा अधोरेखित की है। वहाॅं के लोकतंत्र का एक उदाहरण है की, वहाॅं व्हाइट हाउस के सामने अगर एक व्यक्ती भी अपने हात में बॉनर लेकर अमरीका राष्ट्रपती के विरोध में प्रदर्शन करता है, या नारेबाजी करता है, तो वहाॅं उसे किसी के भी द्वारा किसी प्रकार की रोकटोक नही होती। प्रदर्शन कारीयों पर पुलिस द्वारा डंडे चलाना तो दूर की बात है। पुलिस सिर्फ चुपचाप देखती रहती है। यह उदाहरण हमारे वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्रि ने अमरीका का दौरा करने के बाद दिया है। और यही लोकतंत्र की परिभाषा है। हमारे प्रदर्शन कारीयों का पुलिस क्या हाल करती है, यह देशवासीयों ने देखा है/देख रहे है। पिछले लगभग १२ सालों से हमारे न्यायालयों की कार्यप्रणाली कैसी चल रही है, यह भी देश देख रहा है। लेकिन अमरीका कोर्ट के इस फैसले से ट्रम्प बाबू काफी बौखलाऍ, इस पर उन्होने ‘जजों को शर्म आनी चाहिए’ ऐसी टिप्पणी की। पता नही इसके बाद ट्रंप अपने इरादों का रूख़ कैसे रखेगा? कोर्ट के सामने झूकेगा या फिर और कोई नई चाल चलेगा। क्यों की ट्रंप का व्यक्तीत्व विवादों से घिरा हुआ है। खैर! वहाॅं के कोर्ट में ९ जजेस की बेंच होती है। उस में से ६ जजेस को सत्ता पक्ष ने नियुक्त किए है, मुख्य जज की नियुक्ती तो खुद्द ट्रम्प महाशय ने की थी। वहाॅं के जजों ने अमरीकन काॅंस्टिट्युशन के बुनियादी ढांचें के आधार पर फैसला दिया तो जाहीर है ट्रम्प बाबू अपने ही जजों पर भडका होगा। जिसके मन में अहंकार के भाव हो या किसीने उसके अहंकार को ठेच पहुंचायी हो तो उसकी ऐसी ही अदावत रहती है। हमारे देश के जिल्ह-ए- इलाही की स्थिती भी अलग नही। टेरिफ घटने से आधी आबादी से ज्यादा अमेरिका की आवाम खुश है। इस में व्यापारी और ग्राहक वर्ग है। टेरिफ से दुनिया के मुल्क पीडित थे वो भी खुश हुये होंगे। हमारा देश कुछ ज्यादा ही पीडित था। अब सवाल यह है की, जब की अमेरिका के कोर्ट में टेरिफ के विरोध में मामला चल रहा था तो हमारे दिल्ली तख्त के आला कमान ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील करने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों की? यह सवाल हमारे यहाॅं के पत्रकार, विशेषज्ज्ञ, और बुद्धिजीवी वर्ग उठा रहे है। टेरिफ के विरोध में कानूनी मामला भारतीय मूल के नील कुमार कत्याल लड रहे थे। उन्होने कोर्ट के सामने ऐसी दलिलें पेश की है की, ट्रम्प के वकीलों में ख़ामोशी का आलम छा गया। उन्होने अपने दलील में कहाॅं, टेरिफ का मामला अमरीकन सिनेट के अधिकार क्षेत्र आता है। वो अधिकार राष्ट्रपती को नाही। राष्ट्रपती किसी भी मुल्क पर अपने मन से मनमानी टेरिफ नही लगा सकते। यह हमारे काॅंस्टिट्युशन का उल्लंघन है। कोर्ट ने उनके दलिल को स्विकार करते हुए फैसला दिया। और वकील नील कुमार कत्याल ने कोर्ट केस जीत ली।
नील कुमार कत्याल अमरीका में नामी वकीलों में से एक है। हार्वर्ड और केंब्रिज जैसे युनिव्हर्सिटी में उनकी पढाई हुयी। उनके साथ उस वक्त अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपती बराक ओबामा भी पढते थे। कत्याल भारतीय मूल के है। अब वे अमरीकन नागरिक है। उनके मातापिता पंजाब के है, बाद में वे दिल्ली शिफ्ट हुए। ऐसे कही भारतीय टॅलेंट विदेशों में कही क्षेत्र में है, जो विदेशों में अपने टॅलेंट का प्रदर्शन करते हुए वहाॅं की व्यवस्था में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है। जिनके योगदान से हर क्षेत्र में वे देश अग्रेसर रहते है। लेकिन हाय रे हमारी किस्मत… हमारे देश में ऐसे टॅलेंट की कदर नही होती। काश अगर कदर होती तो
हमारा भी देश हर क्षेत्र में अग्रेसर होता। कम से कम विदेशी देशों से बराबरी करता। आज भी हमारे देश में टॅलेंट की कमी नही।सिर्फ उनको उनके टॅलेंट की कदर करनेवाला मिलना चाहिए। खैर! अमरीकन कोर्ट के फैसले को लेकर दुसरा सवाल यह भी है की, ट्रंप ने दबाव डालर भारत के साथ कोर्ट के आदेश के पहले जो ट्रेड डील की थी वो अब आदेश के अनुसार रद्द होगी या जैसी थी रहेगी? ऐसे बहोत से सवाल हमारे मन में उठ रहा है। क्या भारत पर से अमरीका का दबाव कम होगा? क्या भारत भी अमरीका के सामानों पर टेरिफ लगाएगा? जो आज 0% है। क्या भारत अब रशिया और ईरान से सस्ता तेल खरीद पायेगा? जो हमारे पारंपरिक मित्र राष्ट्र रहे है। क्या भारत पर से अमरीका का दबाव हटेगा या कम होगा? देश के रहनुमाने देश हित में अपनी विदेश नीती, कुटनीती और अर्थ नीती अपने हिसाब से चलानी चाहिए ना की किसी परदेशों के दबाव में। किसीने पानी को बहाने से गंगा बहती नही, उसके लिए गंगा का अपना खुद्द के पानी का स्रोत होना चाहिए हुजूर… खुद्द का। खैर! उपरी सवालों का खुलासा आनेवाले दिनों में होगा। देखते है, आगे आंतरराष्ट्रीय स्थिती कैसी रहेगी!
अशोक सवाई
91 5617 0699
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