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भारत अमेरिका ट्रेड डील = किसानों के लिऍ डेथ वारंट-अशोक सवाई

(व्यापार की डील)

भारत अमेरिका ट्रेड डील की संयुक्त घोषणा हो गयी। अमेरिका के सनकी राष्ट्रपती डोनाल्ड ट्रम्प और व्हाइट हाउस की प्रवक्ता यह पहले से ही कह रही थी की, इंडिया और अमेरिका के बीच ट्रेड डील होगी। यह डील सिर्फ और सिर्फ अमेरिका के लिए फायदेमंद है। जब दोनों मुल्कों के बिच व्यापारी डील होती है तो दोनों मुल्कों का नफा नुकसान देखा जाता है। यहाॅं तो एकततर्फा फायदा अमेरिका के पक्ष में जा रहा है। इस में भारत के लिए कुछ भी नही, उलटा नुकसानदाई है। युं कहिए भारत के किसानों का हित, मॅनिफॅक्चरिंग का हित भारत ने पूरी तरह अमेरिका के हवाले कर दिया। अगले कुछ सालों में 50 बिलियन डाॅलर का सामान अमेरिका से भारत खरीदेंगा। अच्छा! कहाॅं जा रहा है की जो सामान अमेरिका से भारत आयेगा उस पर टेरिफ बिलकुल 0% होगा या मामुलीसा होगा। इसकी पूरी डिटेल्स अभी आनी बाकी है। अब तक भारत ने डील में कृषी क्षेत्र को खोला नही था वो अब अमेरिका के लिए पूरी तरह खोल दिया है। भारत सरकार के वाणिज्य मंत्री कहते है, हमने मक्का, सोयाबीन जैसे चीजें इस में शामिल नही की। वल्लाह क्या बात है!… दिल्ली तख्त के बादशहा, हुकूमत के हुक्मरान, मुल्क के रहनुमा, जिल्ल-ए-इलाही के वज़र-ए-आज़म, अजी! परंतु मक्का का प्राॅडक्ट और सोयाबीन का तेल तो इस में शामिल है ना जी। इस तेल और मक्का के प्राॅडक्ट के आयात पर 0% टेरिफ रहेगा जी। और भी कही कृषी उत्पाद है, डेअरी प्राॅडक्ट है, जैसे की बटर है, चीज है। ऐसी चीजों पर भारत में 0% टॅक्स होगा। इसका मतलब सीधा है, अगर इस डील पर दोनों पक्षों के दस्तख़त होते है तो हमारे 72 करोड याने की देश की आधी आबादी इस डील से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है हुजूर! किसान पूरी तरह मर जायेंगे, बरबाद हो जाएंगे, तबाह हो जायेंगे। अगर किसान संघठन के मुखिया और राज्यसभा के सांसद संजय सिंग इनके लब्जों में कहाॅं जाए तो यह डील किसानों के लिए डेथ वाॅरंट है जनाब, डेथ वाॅरंट! उनके मौत का सौदा है, और सौदागर कौन होगा कहने की जरुरत नही। निर्दयी और मग्रूर ट्रंप ने भारत से कहाॅं ईरान से सस्ता तेल और गॅस न खरीदें हमारे वाले बोले हां जी हुजूर नही खरीदेंगे जी। ट्रम्प ने कहाॅं रूस से सस्ता क्रूड ऑइल न खरदें, सरकार के नुमाइंदे घुटनों पर आकर बोले जी बिलकुल ऐसा होगा मायबाप! अगर भारत रूस से तेल खरीदारी करता है तो ट्रम्प ने भारत पर और 25% टेरिफ लगाने की धमकी दी है। भारत रूस से तेल न खरीदे इस पर ट्रम्प का सर्जीओ गौर नाम का पिठ्ठू निगरानी करेगा और उस की रिपोर्ट अपने मालिका को देगा। भारत सिर्फ अमेरिका और वेनेझुएला जो अभी अमेरिका के कब्जे में है। इन से मेहंगे तेल की खरीदारी करेगा। हिटलर दिमाग का ट्रम्प नाम का यह शख्स सारी दुनिया के साथ टेरिफ-टूरिफ का खेल, खेल रहा है। हमारे साथ कुछ ज्यादा ही। इस लिए दुनिया के देश ट्रम्प का सत्ता काल समाप्त होने का इंतजार कर रहे है। अगर यह मानसिक रोगी ट्रंप हमारे अंदरूनी मामले में दखल अंदाजी देकर हमारे कारोबार में मनमानी करेगा तो क्या अब हमारे देश की विदेश नीती, अर्थ नीती, व्यापार नीती क्या और कैसे होगी यह अपनी बुद्धी गिरवी रखने वाला, पक्का व्यापारी नीती का परदेशी ट्रम्प तय करेगा? यह तो देश के संप्रभूता पर वार होगा। भारत का कृषी उत्पाद ओर मॅनिफॅक्चरिंग उत्पाद जो अमेरिका में निर्यात होगा उस पर 25% का टेरिफ घटाकर 18% कर दिया। इस पर हमारे वाले अंधभक्त इव्हेंट करने लगे, नाचने गाने लगे, जश्न मनाने लगे। इस में गोदी मिडिया के पत्रकार भी शामिल है। डॉ. मनमोहन सिंग के सत्ता काल में यही टेरिफ 2.96% या 3% का था। इव्हेंट करने वाल ऐसे बुद्धीहीन भक्तों को क्या ही कहें।

अगर अमेरिका की धमकी से हमको अमेरिका से तेल खरीदना पडा तो मेहंगाई आसमां छुएगी, नही उसका निर्देशांक आसमान चीर कर पार होगा। और इसका बोझ मुल्क की आवाम पर ही पडेगा। अगर तेल की किमते बढती है तो ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी बढता है, ट्रांसपोर्ट खर्चा बढता है तो मेहंगाई बढती है। और साधी चाय की प्याली भी मेहंगी होती है, सब्जी की मूली के भाव भी बढते है साहब… इस से आवाम हैरान होगी, परेशान होगी। आम जनता का जीना मुश्किल होगा। जो आज जैसे तैसे जी रही है। किसान तो जीते जी मर जाएगा। हमारे किसान बहुतांश अल्प भूधारक है। इसका सरकार को कोई इल्म है? या नही भी? डील को लेकर देश के किसान, जिनका जमीर अभी जिंदा है, जिनकी रीड की हड्डी सत्ता के सामने झुकी नही, वो सोशल मीडिया के पत्रकार, गिने चुने प्रिंट मिडिया के पत्रकार और जनता, सारे सरकार पर बडे तल्ख सवाल उठा रहे है। लेकिन सरकार हमेशा की तरह मौन धारन कर बैठी है। एक प्रकार से उनका मौन कह रहा है, जनता के प्रति हमें बिलकुल भी संवेदना नही, चिंता नही। अगर अमेरिकन कृषी सामान भारत में आयेगा तो उस पर 0% टेरिफ होगा और वो सामान भारत में सस्ता पडेगा। ग्राहक वर्ग जहाॅं सस्ती चीजे मिलेगी वही जाएगा।यहाॅं किसानों को फसलों की लागत का खर्चा छोडकर मुनाफां कमाना मुश्किल होगा। मुनाफां छोड दिजीएगा जनाब-ए-मन, लागत की किमत वसूल होगी या नही इसकी चिंता हमारे किसानों को रहेगी। इसका ख़ामियाज़ा सारे मुल्क को भुगतना पडेगा। सोचिए जरा, जब डील पूरी तरह लागू होगी तो तब क्या होगा? ऐसे में किसान फांसी का फंदा अपने गले में लटकाने के लिए मज़बूर होगा। महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान आज भी आत्महत्याऍ कर रहे है। अमेरिकन किसानों को वहाॅं की सरकार लाखों डाॅलर की सबसिडी देती है। यहाॅं की सरकार हमारे किसानों को क्या देती है? हमारे किसानों ने तीन काले कृषी कानून के विरोध में दिल्ली के सीमाओं पर 2020 में बडा प्रदर्शन किया था, वो तेरा महिनों तक चला और उस में सरकार को झुका कर बडी जीत हासील कर के कामयाब भी हुए थे। कही ऐसा तो नहीं किसानों की जीत का बदला अब सरकार अमेरिका से डील कर के उनको नेस्तनाबूत करना चाहती है? सरकार के रवैये से तो यही लगता है। क्यों की सरकार के पास ना किसानों के लिए कोई दयाभाव है, ना ही जनता के लिए है।

इधर किसान संघठनों मे डील को लेकर सरगर्मीयाॅं काफी तेज हुयी है। उत्तर भारत की किसान कौम एक मार्शल कौम है। उनके मिल्ट्री जवान लडके देश की सरहद्द की रक्षा करते है। किसान कौम किसी भी मग्रूर या तानाशाही सरकार को संवैधानिक आंदोलनों से झुकाने की ताकद रखती है। इसका उदाहरण 2020 में देशवासीयों ने देखा है। उत्तर भारत के किसानों के साथ इस बार देश के छोटे बडे तमाम किसान संघठन जुडे है। चाहे वो दक्षिण भारत के संघठन हौ, मध्त भारत के हो, चाहे महाराष्ट्र के हो या गुजरात के। उनका पिछला आंदोलन देश का अंदरूनी मामला था। इस बार का आंदोलन देश हित में बाहरी नाजायज ताकदों से लडने के लिए सरकार को प्रवृत्त करने के लिए है। यह आंदोलन सिमित नही रहेगा, लंबे वक्त तक चलेगा। क्यों की अब की बार किसानों का जीने मरने का सवाल है। इस बार किसान आंदोलन की ताकद दुगनी, चौगुनी हो सकती है। किसान संघठनो ने आंदोलन 12 तारीख को शुरू करने का ऐलात कर दिया है। सरकार के मुखिया पर उनके भक्तों को छोड दिया जाए तो सारी जनता का, इस में 72 करोड किसान भी शामिल है, समूच्च विपक्ष का, नुयार्क कोर्ट में चल रहा है उनके परममित्र या हमारे राष्ट्रीय शेठ का मामला, सरफिरा ट्रम्प की घडी घडी टेरिफ की धमकी का मामला, इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू से दोस्ती, उस दोस्ती से निकल आई जेफ्री एपस्टाईन की फाईल, उस से बढती हुयी सियासत की सरगर्मीयाॅं, विपक्ष महिला सांसद द्वारा मुखिया पर हमले की आशंका, जो सदन के सभापती ने सदन में बीना सबूत बेवजह जतायी थी, (सभापती के बुद्धी पर दया आती है) उस पर विपक्ष ने जोरदार मचाया हुवा हंगामा, अपने पक्ष में मतभेदों का सियासी टकराव और भी छोटी बडी समस्याऍ है। यह सारी चीजें अब मुखिया का जी का जंजाल बन चुका है। इन सारी चीजों का मुखिया पर भयंकर प्रेशर है। पता नही इतने जबरदस्त प्रेशर का वे मुकाबला कैसे करेंगे? देखते है आनेवाले वक्त का मिजास कैसा रहेगा।

अशोक सवाई
91 5617 0699.

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