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ईरान-अमेरिका युद्ध के दहलिज पर-अशोक सवाई

(आंतरराष्ट्रीय युद्ध स्थिती)

आज सारी दुनिया में युद्ध की स्थिती बनी है। गज़ा में इस्त्रायल के विरोध में फिलिस्तीनी है, लेबनॉन के हिज़्बुल्लाह, यमन के हुती इनका काफी दिनोंसे इस्त्रायल के विरोध में सामरिक संघर्ष चल रहा है। हिज्बुल्लाह, हुती और हमास को ईरान का सपोर्ट है। यह तीनों इस्रायल के विरोध मे युद्ध के लिऍ तैयार बैठे है। उधर रूस और युक्रेन में पिछले तीन सालों से युद्ध चल रहा है। ग्रीनलँड के मुद्देपर नाटो देश जिस में २७ युरोपियन देश शामिल है। यह सब एकजूट होकर अमेरिका के विरोध में खडे हो गये। जो पहले अमेरिका के मुखातिब थे। जून २०२५ को ईरान-इस्रायल में सिमीत युद्ध हुऑं था वो फिर से ईरान-अमेरिका और इस्रायल के बीच शुरू होने जा रहा है। बताया जा रहा है, यह युद्ध पहले से कही ज्यादा घनघोर और भयानक स्थिती में होगा। अमेरिका ने इस युद्ध की पूरी तयारी कर रखी है। उसने युएसएस अब्राहम लिंकन यह समुद्री जंगी जहाज ईराने के समुद्री सीमा तक लाया है। या उसे गल्फ ऑफ ओमान में तैनात किया है। और ईराने के पश्चिमी क्षेत्र से युएसएस जाॅर्ज बुश नाम का जंगी बेड़ा भी मिडल ईस्ट में तैनात होने वाला है। विषेशज्ज्ञ का मानना है की अमेरिका के यह दोनो विशाल जहाज युद्ध के लिऍ दुनिया के सब से शक्तिशाली और खतरनाक जंगी जहाज है। अब्राहाम लिंकन जंगी जहाज में ५०० फायटर जेट तैनात है जो अब्राहम लिंकन से हवा में उड कर दुश्मन पर अटॅक कर सकते है। इस जहाज के साथ साथ अमेरिका के ९-१० पनडुबीयाॅं भी शामिल है जो पानी के अंदर युद्ध लड सकती है। इसके अलावा मिडल ईस्ट में जैसे बहरीन, कतर, कुवैत, सऊदी अरब, जाॅर्डन, तुर्की और इराक में अमेरिका के मिल्ट्री बेस है। लेकिन जाॅर्डन छोडकर बाकी सभी मुल्कों ने साफ साफ कहाॅं की हम अपनी जमीन और आसमां का इस्तेमाल ईरान के विरोध में नही होने देंगे, इस में और भी कही मुल्क है। अब अमेरिका उस मुल्क से अपने एअर क्राफ्ट कॅरिअर आयर्लंड कंट्री सायप्रस, जॉर्डन या जंगी जहाज अब्राहम लिंकन यहाॅं शिफ्ट कर के वहाॉं से ईराने पर हवाई हमले कर सकता है। कुल मिलाकर अमेरिका ने चारों तरफ से ईरान की मिल्ट्री घेराबंदी की है, उस पर मानसिक दबाव डालने की कोशिशे हो रही है। युद्ध विषेशज्ज्ञ का कहना है की, पिछले २५-३० सालों से ऐसी जबरदस्त घेराबंदी देखी नही थी। ट्रम्प ज्यादा तर अपने बडबोलापन और उतावळेपन के शिकार है। वे घंटे घंटे में अपने बयान बदलते राहते है। कभी कहते है हम ईरान से बातचीत करेंगे तो कभी कहते है हम ईरान पर हमला करेंगे इस से उनकी बेचैनी साफ झलकती है। इस से लगता है ट्रम्प दुविधा मन में है। इसका दुसरा कारण यह भी है, मध्ये पूर्व में सौदी अरब के मोहमद बीन सलमान, कतर के बादशहा अहमद अल्थानी, कुवैत के बादशहा अल् जबर अल् सबा तुर्की के बादशहा रजब तैय्यब इर्दोगान इन बादशहाहतो ने या उनकी सल्तनतों ने ट्रम्प बाबा को समझाया की, महाराज आप ईरान पर हमला ना करे तो अच्छा है दांव उल्टा भी पड सकता है और इससे हमारा भी काफी नुकसान होगा, हमारे तेल कुवें का भी नुकसान होगा जो हम नही चाहते। मिडल ईस्ट के इन बादशहाओं के ट्रम्प बाबा के साथ अच्छे संबंध है। यह भी कारण है ट्रम्प की दुविधा मनस्थिती का। लेकिन ट्रम्प एक ऐसे शख्श है जो सुनते है सब की परंतु करते है मन की। वे हर किसी को धमका कर मानसिक दबाव डालने की कोशिश करते है। जो मानसिक दबाव में आते है उनको अपने अजेंडा पर काम करने के लिए मजबुर करते है। या फिर वेनेझुएला के मुखिया जैसे कमजोर निकोलस मादुरो को उठाकर बंदी बना देते है। किसी को भी धमकाने की उनकी हमेशा की फ़ितरत रही है। इस दादागिरी से ही वे दुनिया में जाने जाते है। लेकिन अगर कोई उनके सामने तनकर खडा हुऑं तो वे अपने कदम पिछे खींच लेते है यह भी सच है। जैसे की रूस हो या चायना का उदाहरण है। वेनेझुएला का प्रयोग वे ईरान पर करना चाहते है लेकिन ईरान तो ईरान है। वो अमेरिका के आगे किसी प्रकार की घास डालने को तयार नही। ट्रम्प बाबा पहले ईरान का रिझिम या निजाम बदलने की बात कर रहे थे। अब वे ईरान को न्युक्लिअर वेपन बनाने का कार्यक्रम रद्द करने के डील पर साइन करने की बात कर रहे है, जो ईरान को हरगीज़ मंजूर नही। ईरान का कहना है यह हमारे संप्रभूता पर हमला है। वो बर्दास्त नही किया जा सकता। युद्ध के आसार देखते हऍ दुनिया के देशों ने मिडल ईस्ट के आसमां से अपने अपने पॅसेंजर प्लेनों का आवागमन ११ फरवरी तक रोक दिया है।

हमारे भारत के दो आंतरराष्ट्रीय स्तर के तजुर्बेकार सिनियर पत्रकार है जो युद्ध स्थिती की खबरबात रखते है। उस में एक है अमरीश मिश्रा और दुसरे है अहमद काजमी। दोनो मिडल ईस्ट की गतिविधीयोंं पर खास कर ईरान पर अपनी पैनी निगाहे बनाऍ रखते है। जिन्होने इस जनवरी के पहले सप्ताह में ईरान का दौरा किया था। नाम है अमरीश मिश्रा वे ईरान और पूरे मिडल ईस्ट पर वहाॅं की गतिविधीयों पर अपनी बारीकी से निगाह रखते है। दोनो पत्रकार ईरान के दौरे करते रहते है। वहाॅं पत्रकारों से, संपादकों से, मिडिया से बातचीत करते है। वहाॅं उनकी पाॅलिटीकल लिडर, वहाॅं के मिल्ट्री अफसरों से मुलाकातें होती रहती है। कुल मिलाकर हमारे यह दोनो पत्रकार ईरान के मिजास को अच्छी तरह से जानते है समझते है। अमरीश मिश्रा ने वहाॅं कुछ ईरानी साइंस्टिट, पत्रकार, मिडिया, कुछ पाॅलिटीकल लिडर और अयातुल्ला अली खामेनेई के सलाहगारों से बातचीत की। अगर ईरान और अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से इस जंग म उतरते है तो ईरान का मिजास क्या और कैसा रहेगा इसकी जानकारी ली। अमरीश मिश्रा कहते है ईरान की प्रमुख ताकद उनके मिसाईलों का ज़कीरा है और उसकी संख्या का कोई भी अंदाजा नही। मानो जमीन के अंदर मिसाईलों का एक शहर बसा है। उस में सुपर सोनीक मिसाईले है, बॅलेस्टिक मिसाईले है, खुर्रम शहर 4 और 5 टाईप के मिसाईले है, फतेह जैसे घातक मिसाईले है। इसके बावजूद ईरान के पास शेजल मिसाईले है जो हवा में नाचती हुई दुश्मन के निशानों से अपने आपको बचाते हुऍ अपने लक्ष का पिछा कर के उसे तबाह कर सकती है। अच्छा! यह मिसाईल हवा में नाचती है तो दुश्मन को उसे निशाना बनाकर उसे मार गिराना बहोत मुश्किल है। ट्रम्प को इसी का ही तो खौप है। खुर्रम शहर और फतेह मिसाईले जो दस हजार या उसे से भी ज्यादा की दूरी का लक्ष एक घंटे में तय कर सकते है। इसके ज़द में वाॅशिंग्टन और रक्षा मंत्रालय पेंटॅगॉन भी आ सकते है। और तो और यह मिसाईले युएसएस अब्राहम लिंकन और जाॅर्ज बुन जैसे खतरनाक और विशाल जंगी जहाजों को भी डुबोने की क्षमता रखते है। ईरान के पास और भी ऐसे कही दुनिया के सब से घातक और खतरनाक मिसाईले है जो अभी तक दुनिया के सामने आये नही। हां ईरान के पास फायटर जेट नही, उस कमी को रूस और चायना पूरी करेंगे। इसीलिऍ जंग लडे या ना लडे इसकी दुविधा ट्रम्प बाबू के मन में है। लेकिन वे अब वापस लौट भी तो नही सकते। फिर भी ट्रम्प ईरान को नेव्हल ब्लाॅकेड करने की धमकी दे रहे है। याने की ईरान के अंदर बाहर जहाजों का आवागमन बंद करने धमकी दे रहे है। इस पर अमरीश मिश्रा कहते है अगर अमरीका ने नेव्हल ब्लाॅकेड किया तो ईरान के पास उस से भी घातक शस्त्र है। वो है स्टेट ॵफ होर्मुस को बंद करना। स्टेट ऑफ होर्मुस ईरान के कब्जे में है। इस से मिडल ईस्ट और बाकी मुल्कों के लिऍ तेल निर्यात बंद हो सकता है। और अमेरिका के जो मिडल ईस्ट में एअर बेस है वो भी प्रभावित हो सकते है। इस से अमेरिका की पूरी तरह से नाकाबंदी की जा सकती है। यही वजह थी जो मिडल ईस्ट के बादशहाहतों ने ट्रम्प को ईरान पर हमला न करने की सलाह दी थी। वैसे रूस और चायना भी चाहते है की अमेरिका नौसेना की नौबत ईरान से ही वापस लौट जाऍ। फिर भी जंग होती है और उस में ईरान गिरता नजर आया तो रूस और चायना ईरान को गिरने नही देंगे। वे दोनो अपनी पूरी ताकद लगा देंगे। इससे तिसरा महायुद्ध होने का खतरा बढ सकता है। वैसे ईरान ने पहले ही अपनी सीमा पर अपने दो हजार मिसाईले तैनात कर रखी है। खामेनेई अपने मिल्ट्री अफसरों साथ मिटींग कर रहे है। उधर ट्रम्प भी अपने अफसरों के साथ मिटींग पर मिटींग कर रहे है लेकिन ठोस नतीजों पर नही पहुंच रहे है। सिर्फ ईरान को धमकी देना शुरू है। मिश्रा और काजमी दोनो तजुर्बेकार पत्रकार अयातुल्ला अली खामेनेई के बारे में कहते है, खामेनेई शांत स्वभाव के ईरान के सर्वोच्च लिडर है। वे ट्रम्प जैसे अनावश्यक बयान नही देते। वे पढे लिखे इंसान है, अपने आवाम के साथ गांधी-नेहरू का जिक्र करते है, नेहरू की किताब डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया का जिक्र करते है। वे युद्ध में किसी आंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नही करना चाहते। युद्ध की चाल बिलकुल शतरंज की चाल जैसी महिन चलते है। उनको युद्ध का खौफ नही क्यों की उनको अपने मिसाईले ताकदों पर पूरा भरोसा है, इसीलिऍ वे ट्रम्प बाबा के जैसे दुविधा मन में नही। अमरीश मिश्रा यह भी कहते है की ईरान की आवाम में भारतीयों के लिऍ सम्मान है। ईरान के दुकानदार खरीदारी पर भारतीयों को डिस्काऊंट भी देते है। क्यों की अमरीश मिश्रा ने खुद्द ईरान जाकर इसका अनुभव लिया है।

हमारे एक और भारतीय पत्रकार है, जिनका नाम दिपक शर्मा है। वे २०-२५ सालों से पत्राचारीता में है। वे कहते है डेढसौं साल पहले खामेनेई के परिजन लखनौ के पास की बाराबंकी में रहते थे। शायद हो सकता है इसी वजह से खामेनेई के मन में भारत के लिऍ एक प्रकार का साॅफ्ट काॅर्नर रहा हो। यही कारण है युनो में किसी भी मुद्दे पर ईरान भारत का हमेशा पक्षधर रहा है। हमेशा भारत के साथ खडा रहा, फिर चाहे वो पाकिस्तान का मुद्दा वो या कश्मीर का। ईरान भारत का पारंपरिक दोस्त रहा। आज भी है, आज भी ईरान भारत को रस्ता तेल और गॅस दने के लिऍ तयार है वो भी तीन महिने के क्रेडिट पर। ईरान हमेशा भारत का हितैशी रहा और है। अगर भारत ईरान से तेल की खरीदारी करता है तो मेहंगाई काफी हद तक कम हो सकती है। युरोपियन देशों ने हाल ही में ईरान के विरोध में जो मानवाधिकार का प्रस्ताव लाया था तो भारत ने ईरान के साथ अपने पारंपरिक संबंध ध्यान में रखते हुऍ ईरान के पक्ष में अपना मत दिया था। ईरान ने उसके लिऍ भारत का शुक्रिया भी अद़ा किया। भारत और ईरान के संबंध और भी मजबूत हुऍ तो उसका फायदा दोनो मुल्कों को हो सकता है। भारत ने अमेरिका की हर बात पर कहना मानना छोड देना चाहिऍ। अमेरिका ऐतबार करने लायक मुल्क नही, वो बेभरोसेमंद मुल्क है। भारत को सिर्फ अमेरिका के साथ व्यापारी संबंधों तक ही सिमीत रहना चाहिऍ। हाल ही में भारत की युरोपियन देशों के साथ व्यापार की नयी डील हुयी है। इससे भारत को युरोपियन देशों की नयी बाजारपेठ खुल सकती है उसे थोडा समय जरूर लगेगा परंतु डील तो हुयी है। उस में टेरिफ की झंझट ना के बराबर होगी। इस से अमेरिका का उट अपने आप पहाड के नीचे आऍगा। उसकी दादागिरी बंद होगी। दुनिया के सभी मुल्क खुशाली से जीऍ। हम यहाॅं यह भी कामना करते है की, ईरान अमेरिका का युद्ध न हो, युद्ध को टाला जाऍ। क्यों की युद्ध की किमत दोनो मुल्कों को चुकानी पडेगी। युद्ध का खामियाज़ा दोनो मुल्कों को भुगतना पडेगी। फिर वो चाहे जानमाल का नुकसान हो या धनबल का। हम शांतिदूत से कामना करेंगे की उक्त दोनो मुल्कों का युद्ध न हो और दुनिया के मुल्क तिसरे महायुद्ध से बचे।

अशोक सवाई
91 5617 0699

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