सत्ता का भयंकर विरोध- अशोक सवाई

(मुल्क के बिघडे हालात)
आज मुल्क के हालात इस कदर बिघडे, नही नही मुल्क के हुक्मरानों ने इस कदर हालात बिघाड दिये है की, मुल्क की आवाम सत्ता का भयंकर विरोध करने लगी। क्यों की सत्ता के सत्ताधीशों ने काम ही संविधान विरोध में किया है। जो इस देश की संविधान प्रेमी तमाम जनता को बिलकूल भी रास नही आया। एक प्रकार से मौजूदा हुकूमत ने आझाद लोकतांत्रिक हमारे मुल्क में जनता की आझादी छीन ली गयी, उनके मौलिक अधिकार का हनन किया गया, उनको गुलाम बनाकर रखा गया। इसलिए समुचा विपक्ष, आज की नयी पिढी जेंन-झी, जेंन-अल्फा और सिव्हिल सोसायटी के सारे लोगोंने या युं कहिए की लगभग पूरे देश ने दिल्ली तख़्त के तानाशाहों का डर/भय अपने पैरोंतले रौंदकर सडकों पर उतरे है। और हर दिन उतर रहे है। देश के हर महानगरों मे, हर शहरों में, शहरों के हर कस्बे और चौराह पर मुल्क की आवाम सडकों पर है। और सडकें भी हर दिन गुलज़ार हो रही है। इस जनसैलाब में कोई धर्मभेद नही, जातीभेद नही या किसी के मन में ऊचनिच के भाव नही। सब लोग एकजूट होकर सरकार के विरोध में लड़ने का जज्बा लेकर शांतीपूर्ण संविधानिक रूप से लड़ने के लिए सडकों पर आयी है। अपना वजूद बचाने और वतनपरस्ती के लिए। सत्ता को यही तो परेशानी है ज़नाब!… ना हिंदू-मुसलान हो रहा, ना प्रदर्शनकारियों मे फूट पड रही है, ना ही किसी मुद्दे को भटकाया जा सकता है। इसलिए सत्ता हैरान है परेशान है। एक प्रकार से आवाम मुल्क की दुसरी आझादी के लिए सडकों पर खडी है, ऐसा कहना ग़लत नही होगा। वैसे भी दुनिया के तानाशहा अपनी आवाम से डरे हुवे होते है। यह सच है की वे अपने साया, अपनी आहट से भी डर जाते है। और यह भी सच है की वे आईने के सामने अपनी शकल से भी डरते है। क्यों की उनके मन में उनका अपराध बोध उछलते रहता है। ऐसा मानसशास्त्र का नियम कहता है। अब जनता का लक्ष्य सिर्फ दरबारी राजदार चीफ इलेक्शन कमिशनर जैसे हुकूमत के मोहरे तक सिमीत नही, मामला उससे भी आगे निकल चुका है। आज आवाम का मिजास इस मुल्क की रिजीम चेंज करना है, सत्ता बदलना है। इससे लागता है की सत्ताधीशों का इक़बाल खत्म हो चुका है। वक्त का अपना एक मिजास होता है, कभी वो बेरहम तो कभी मेहरबाॅं होता है। पिछले बारा सालों से दिल्ली तख़्त के जहाॅंपनाह और उनके वज़ीर-ए-आज़म या उनकी बादशहाहत के लिए वक्त का मिजास बडा ही मेहरबान था, लेकिन वक्त ने अपनी करवट बदलते ही वक्त का मिजास सत्ता के आलमगीर उनके दरबारीयों के लिए बेरहम बन गया। दूसरी ओर से रिजीम चेंग करने के लिए सडकों पर जद्दोजहद्द करनेवाली आवाम को भी इस मुग़ालते में नही रहना चाहिए की सत्ता के सत्ताधीश युं ही नही अपनी सत्ता की शहादत दे देंगे। चाहे बडे बडे हिंदी पत्रकार या राजनैतिक विषेशज्ज्ञ भले ही मौजूदा सत्ता को चल चला की बेला कहें। लेकिन हमारा आकलन थोडासा अलग है। मान लिजिएगा आवाम के दबाव में सत्ताधीशों ने अपनी सत्ता की शहादत दे भी दी तो आनेवाली नयी सरकार इनकी असंविधानिक कारनामों की फाइले खोलेगी। फिर क्या होगा? हुजूर-ए-आला!… यह भी डर उनको बेहद सता रहा होगा। रातों को सुख चैन की निंद नही आती होगी। इसलिए अलाकमान के मुख्यकमल पर मुस्कूराहट की हलकीशी लकिर भी दिखायी नही देती। हां एक हो सकता है, आनेवाले संकट से खुद्द को बचाने के लिए जहाॅंपनाह खुद्द को राष्ट्रपती और गृहमंत्री को उपराष्ट्रपती के रूप में प्रस्थापित कर सकते है। क्यों की महामहीम राष्ट्रपती द्रौपदी मूर्मू जी का कार्यकाल २०२७ में समाप्त होने जा रहा है। ऐसा कयास लगाया जा सकता है। या फिर वे देश छोडने पर मजबूर हो सकते है। वक्त का निर्णय कुछ भी हो सकता है। इधर सत्ताघीशों को हटाने के लिए जनता को लंबी लड़ाई लड़नी पडेगी। और लोग भी आर-पार की लड़ाई लड़ने के मुड में है। खुद्द को जिल्ह-ए-इलाई (ईश्वरी कृपा/छाया= नाॅनबाॅयलाॅजीकल) कहनेवाले आला कमान को आज जो कुछ देश में हो रहा है इसका इल्म अपनी असंविधानिक करतुतो से पहले से ही होना चाहिए था। लेकिन वे लोग अपने सत्ता की मस्ती में चूर थे। यह भी इनकी एक फ़ितरत रही। इनको लगा इस प्रोटेस्ट को हम हमारी हुकूमत के दम पर युं निपटा देंगे या खत्म करेंगे लेकिन दिल्ली तख़्त के बादशहा सलामत, उनके वज़ीर-ए-आज़म और राजदरबारीयों ने भी इस मुग़ालते में न होना चाहिए की हम हुकूमत के दम पर विरोध प्रदर्शन को खत्म कर देंगे। ऐसा बिलकुल भी होनेवाला नही। इतिहास गवाह है हुजूर!… दुनिया के बडे बडे तानाशहा अपनी सत्ता के नशे में जब जब बेलगाम हुवे है, तब तब उनके मुल्क की आवाम ने अपने आगे उनको नाक रगडवाकर उनकी अहंकारी नांगी अपने सामने डालने के लिए मजबूर किया था। या वे इस जहाॅं को अलविदा कह कर चले गये। इस विरोध प्रदर्शनों में एक बात जरूर दिखाई दी गयी की प्रदर्शन को बिघाडने या फूट डालने के इरादों से अपने आंकाओं के इशारों पर कुछ असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुस गये थे, लेकिन सतर्क जेन झी ने उनकी नाजायज हरकतें पुलिस के सामने उजागर कीए। और शायद पुलिस ने भी उनको सक्त हिदायत दी होगी। फिर से उनकी नाजायज हरकतें करने की खबरे नही आयी।
देश में सल्तनत के सुल्तानों के विरोध में जो प्रदर्शनकारीयों का प्रदर्शन चल रहा है, वो अब देश की सीमाऍ लांघकर विदेशों में चला गया। पराऍ मुल्क में जहाॅं जहाॅं भारतीय मूलनिवासी रहते है वहाॅं वहाॅं भारी विरोध प्रदर्शन होने लगा। जैसे की लंदन, युके, बर्लिन, जर्मन, अमरीका जैसे प्रगत राष्ट्र और शहर भी प्रदर्शनकारीयों के ज़द में आए है। सोचिए जरा, हमारी सत्ता और सत्ताधीशों के बारे में दुनिया क्या सोचती होगी? फिर भी हमारे यहाॅं के संवेदनाहिन हुक्मरान, सत्ता के भोगी लोगों को इसका कोई भी ग़म पस्तावा नही। विदेशों में भारत का तिरंगा लहरा कर प्रोटेस्ट हो रहे है। 56 इंच के खिलाफ़ वहाॅं बडे मजेदार अल्फाजभरे लहजें में नारे लग रहे। वहाॅं के बडे दिलवाले सत्ताधीशों कों उनके वतन में भारत का तिरंगा लहराने से कोई आपत्ती नही, लेकिन हमारे वतन में हमारा ही तिरंगा लहराने से हमारे सत्ताथीशों कों बडी आपत्ती होती है। साहब!… बडी आपत्ती! क्या ही कहाॅं जाए ऐसे लोगों कों? बडी ही अजब गजब की हमारी सत्ता नाम की चीज है भाई!
प्रदर्शनकारीयों के लिए प्रदर्शन स्थल सत्ता स्थल के निकट होना चाहिए ऐसा एक संकेत है। और होना भी चाहिए, जैसा की राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर है। क्यों की सत्ता प्रदर्शनकारीयों की आवाजें सुन सके, उनकी मांगे समझ सके और उनकी समस्याओं का समाधान कर सके। पाठकों को याद होगा हमारे रहनुमाने एक नारा दिया था की ‘बेटी बचाओं बेटी पढाओं।’ बडा अच्छा था नारा! लगने लगा अब बेटीयों की हालातें सुधर जाएंगे। कम से कम उनके लिए अच्छे दिन आयेंगे मगर हाय रे हमारी बेटीयों की किस्मत!… जंतर मंतर पर सत्ता के खिलाफ़ प्रदर्शन करनेवाली बेटीयों पर रहनुमा की पुलिस कहो या उनके वजीर-ए-आज़म की। उन्होने बडी बेरहमी से लाठी डंडे बरसाए, बच्चीयों को सडक पर घसीटा, पीटा जनता के रक्षक कहने वाले पुलिस ने मासूम बच्चीयों को दुनियाभर की गंदी गंदी गालीया बकी, उनके कपडे फाड दिये, डिटन करने के बहाने उनके शरीर को किसी गिद्द की तरह यहाॅं वहाॅं नोंचा गया और अपनी मर्दानगी साबित की पुलिस ने। बडा ही बर्बरतापूर्ण पुलिस का रवैय्या रहा था, जनाब-ए-मन! हमारे बच्चियों के साथ। वाह रे दिल्ली पुलिस! डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी ने एक जगह कहाॅं था की ‘स्त्री समाज का एक बहुमूल्य अलंकार है, समाज ने उसकी हिफ़ाजत/रक्षा करनी चाहिए’ लेकिन समाज के कुछ असामाजिक तत्वों ने क्या किया? उसने स्त्रीयों को एक भोगदासी बनाकर रखा है। ऐसे नीच नाजायज तत्द की हमें घिन्न्ह्ह आती है साहब, घिंन्न्ह्ह!… और दुनिया में हमारे देश की साख निचे गिरती जा रही है… गिरती ही जा रही है। जब तक हमारा देश संविधान की राह पर नही चलेगा तब तक आज देश की जो बनी हुयी स्थिती है, वैसेही बनी रहेगी। संविधान के शिवाय देश के सामने कोई दुसरा पर्याय नही हो सकता, कोई भी नही।
– अशोक सवाई
91 5617 0699
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